Tuesday, December 13, 2016

रफ्तार रफ्तार दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है, देखो! गाँवों की ओर सड़कों की और शहरों की ओर लोगों की। रफ्तार दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है, देखो! गाँवों की ओर अपराधों की ओर शहरों की ओर संस्कृति की। रफ्तार दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है, देखो! गाँवों की व्यापार की, शहरों की और बेरोजगार की। रफ्तार दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है, देखो! गाँवों की ओर विश्वास की, शहरों की ओर अविश्वास की। रफ्तार दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है देखो! गाँवों की ओर विनाश की शहरों की ओर विकास की । रफ्तार दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है, देखो! शहरों की ओर इंसानियत की, गाँवों की ओर हैवानियत की। रफ्तार दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। @ - पंक्तियाँ, सर्वाधिकार, सुरक्षित, राजेन्द्र सिंह कुँवर 'फरियादी'

आँखि खोल द्या बक्त ऐगी देख्णो आँखि खोल द्या बक्त ऐगी बोनो  भट्याकी बोल द्या अदलि बदलि देख्ला कब तैं अब त बटोल द्या! बक्त ऐगी देख्णो आ...