Tuesday, December 13, 2016

गाँव बुढा हो चला है क्यों लौट रहे हो बर्षों बाद आँखों में आँसू लिए किसको ढूंढ रहे हो। गाँव बुढा हो चला है तुम भी घुटनों पर उठ कर गिर रहे हो, फिर आज यूँ क्यों लड़खड़ाते हुये कदम वापस बढ़ा रहे हो। गाँव बुढा हो चला है वो भूल चुका है तुम्हें तुम भी भूल चुके थे किसके लिए तुम पत्थर रख हृदय में यूँ वापस आ रहे हो। गाँव बुढा हो चला है अशिक्षित है मगर अपनी मातृभाषा को पहिचानता है तुम तो विदेशी भाषाओँ के बादशाह बन बैठे थे फिर क्यों लौट आये। @ - सर्वाधिकार सुरक्षित, राजेन्द्र सिंह कुँवर 'फरियादी'

~~~ ढुंगा ~~~ ढुंगा उठ्यां भी छन  ढुंगा छुप्याँ भी छन  ढुंगा फर्कणा भी छन  ढुंगा सर्कणा भी छन क्या बोन यूँ ढुंगों कु ढुंगा ढ...